वंदन करने से होती है पापों की निर्जरा- आचार्य श्री विजयराज जी

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संत दर्शन – वंदन  पुण्यवानी का काम- आचार्य श्री विजयराज जी म.सा.

बीकानेर, 11 अक्टूबर। जो क्रंदन को मिटा देता है, उसे वंदन कहते हैं। वंदन पंच परिवेष्टि अरिहंत, आचार्य, साधु, साध्वी और सिद्ध पुरुष को किया जाता है तो उसका परिणाम हमारे लिए शुभ परिणाम लाता है। एक बार हम वंदन करते हैं तो कितने पापों की निर्जरा हो सकती है। साता वेदनीय कर्म के पन्द्रह बोल में से दसवें बोल ‘महापुरुषों को वंदन करता जीव साता वेदनीय कर्म का बंध करता है’ विषय पर व्याख्यान देते हुए 1008  आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने यह बात कही। बागड़ी मोहल्ला स्थित सेठ धनराज ढ़ढ्ढा की कोटड़ी में चल रहे नित्य प्रवचन में महाराज साहब ने फरमाया कि सभी प्रतिहर (अखण्ड) सौभाग्य बनें, यह चाहत रखते हैं, यह सौभाग्य हमें वंदन से प्राप्त होता है। इससे हमारा सौभाग्य कभी खंडित नहीं होता है। वंदन का भाव आदर, श्रद्धा, विनय का भाव है।
आचार्य श्री ने श्रावक- श्राविकाओं से कहा कि भाव पूर्वक अगर आप पंच परमेष्टि को नमस्कार करते हैं तो इससे आपकी पावर बढ़ती है। यह उनके पावर का प्रभाव होता है। एक हम बगैर भाव के अनमने प्रणाम करते हैं तो यह पावर फलीभूत नहीं होती। इसका कारण सबका भाव अलग-अलग होना है। जैसे भाव हम बनाना चाहते हैं, वैसे हमारे भाव बन जाते हैं।
आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने फरमाया कि एक नमस्कार से जीव संसार सागर से तर जाता है। बस, हमारे वंदन की क्रिया वास्तविक होनी चाहिए। इसलिए हमें सबके सुख- समृद्धी और शांति की कामना करते रहना चाहिए।
व्यापार में भी भाव का महत्व
व्यावहारिक शिक्षा पर व्याख्यान देते हुए आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने कहा कि धर्मसभा में जो श्रावक बैठे हैं, वह अधिकांश व्यापार करते हैं।  मैं, उनसे कहना चाहता हूं! व्यापार में भी आप सद्भाव और समभाव रखकर ग्राहक को वस्तु देते हैं तो वह उसे साता पहुंचाने वाली होती है। अगर आपने देते वक्त यह भाव व्यक्त किए हों और नहीं किया तो कोई बात नहीं लेकिन अब यह ध्यान रखो कि वस्तु देते वक्त यह भावना मन में रहनी चाहिए कि मेरे द्वारा दी गई वस्तु उसका हित करे। इससे कई बार यह लेन- देन समस्याओं का समाधान करने वाला बन जाता है। इस संबंध में महाराज साहब ने एक प्रसंग अमेरिका के बैंक का भी बताया।
संत दर्शन से मिलता लाभ
आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने कहा कि संत के दर्शन बड़ी पुण्यवानी का काम होता है। संत दर्शन सहज में नहीं मिलता, पूर्व के जन्म में जिसकी पुण्यवानी हुई है। वही संतो का लाभ ले सकता है। संतो को वंदन करना कभी निष्फल नहीं जाता है। इसलिए हमारी हर वंदन की क्रिया वास्तविक होनी चाहिए। संत दर्शन से कुछ ना कुछ मिलता ही है।
श्रावक- श्राविकाओं ने लिया दर्शन लाभ
श्री शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष विजयकुमार लोढ़ा ने बताया कि मंगलवार को राजनंदगांव और मद्रास से पधारे श्रावक- श्राविकाओं ने आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. के दर्शन कर वंदना की एवं उनके दीर्घायु होने की कामना की। छोटे-छोटे करीब चार- पांच साल के बच्चों ने ‘प्यारे गुरु विजय, मैं तेरी भक्त बन गई’ प्रस्तुत कर आशीर्वाद लिया।  धर्मसभा में व्याख्यान से पूर्व महाराज साहब ने चेतावनी भजन ‘नहीं है भरोसा, जरा जिंदगी का, मजा लूट बंदे , प्रभु बंदगी का, निकलता है सडक़ों पर, फैशन लगाकर, अकड़ता है तन को बड़ा तू सजाकर, पिटारा है यह इक, भरा गंदगी का, मजा लूट बंदे प्रभु बंदगी का’ सुनाकर सभी से धर्म में प्रवृत होने की बात कही। 

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