टुडे राजस्थान न्यूज़ (अज़ीज़ भुट्टा )
101 वर्षीय यज्ञाचार्य पं नथमल पुरोहित एवं स्वामी वसुंधरा आनन्द महाराज का राष्ट्रीय कवि चौपाल में किया सम्मान
किनारा हूं, मेरी अपनी मजबुरियां हैं,तूम समुद्र हो तुम्हारी अपनी मनमर्जियां है..
साहित्यकार सभ्यता संस्कृति का प्रहरी होता है,
साहित्यकार को विकार परे रहकर दिव्यगुणों पर सदा दृष्टि केन्द्रित करें
साधक आवश्यकता न्यूनतम रखें, त्याग वैराग्य प्रभो सान्निध्य स्वत: बन जाते हैं,
दीवटिया ! मत डरजे, लड़जे, बळजे काळी रात रे !
नाम साधारण काम असाधारण, सभी के श्रृद्धेय, रहे विदेह,
बीकानेर 20 सितंबर । स्वास्थ्य एवं साहित्य संगम राष्ट्रीय कवि चौपाल 586 वीं कड़ी *”विषय-विकार… से परे साहित्यकार १”* शीर्षक को समर्पित रही आज के कार्यक्रम अध्यक्षता में डॉ हरिदास हर्ष, मुख्य अतिथि यज्ञाचार्य पं नथमलजी पुरोहित, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ उमाकांत गुप्त विशिष्ट अतिथि राजेन्द्र स्वर्णकार सरदार अली परिहार, गणेश कट्टा आदि मंच पर सुशोभित हुए, कार्यक्रम शुभारम्भ करते हुए रामेश्वर साधक ने कहा बांझ वह भी जो वैचारिक प्रजनन शक्ति में अथवा आचरण में शुन्य है, और जिनकी कथनी करनी में अंतर रहता है।..

राजेन्द्र स्वर्णकार ने .. जय सरस्वती मां उज्ज्वला, जय श्वेतपद्मविराजिता ! जय बुद्धिदात्री ब्रह्मिणी, पद्मोद्भवा श्रुतिरंजिता !! मां सरस्वती की वंदना की
कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ हरिदास हर्ष ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि साहित्यकार को विकार परे रहकर दिव्य गुणों पर सदा दृष्टि केन्द्रित करें।.. मुख्य अतिथि यज्ञाचार्य पं नथमलजी पुरोहित महाराज ने अपने क्रांतिकारी उद्बोधन में कहा साहित्यकार सभ्यता संस्कृति का प्रहरी होता है,साथ ही साथ वह स्वयं को भूल मानवीय पीडा़ जो समझें, वही साहित्यकार से संत ऋषि बन जाता है,.. स्वामी वसुंधरा आनन्द महाराज ने प्रवचन में कहा कि साधक अपनी आवश्यकताओं को न्यूनतम बनाएं, त्याग, वैराग्य, प्रभो सान्निध्य स्वत: बन जाते हैं।..

डॉ उमा कांत गुप्त ने बतौर मुख्य वक्ता बतौर बताया आध्यात्म साहित्य का पर्याय है आध्यात्म में साहित्य की बात.. साहित्य से आध्यात्म अभिव्यक्ति दी जा सकती है, मैं किनारा हूं मेरी अपनी मजबुरियां हैं। तूम समुद्र हो तुम्हारी अपनी मनमर्जियां है।।.. राजेन्द्र स्वर्णकार : दीवटिया ! मत डरजे, लड़जे, बळजे काळी रात रे ! रंग थनैं ! तूं ल्या मुट्ठी में सोनळिया परभात रे !.. सरदार अली परिहार साहित्यकार का लेखन अनवरत रहे पर आचरण के साथ
डॉ कृष्ण लाल विश्नोई : ओ म्हारो सोहणो देस है, इण नैं मनमोहणो बणाओ। उण सोन चिड़ी नैं फेरूं जीवावो ।। रामेश्वर साधक : नाम साधारण काम असाधारण, सभी के श्रृद्धेय, रहे विदेह, दुनियां जानें जिन्हें यज्ञाचार्य पं नथमल जी.. लीलाधर सोनी : मुझे बीत गया दिन बौत, खुला ना ज्ञान चक्षु का, भेद न पाया आ इस जग में असुर और इंसान का,.. शिव प्रकाश दाधिच : वक्त भले ही धूल उड़ाए, इतिहास के पन्नों पर, गूँज रहे हैं वीर सदा, भारत माँ के जयकारों पर।.. राजकुमार ग्रोवर : शायर कवि साहित्यकार होता नहीं इनमें कोई विकार.. कमल किशोर पारीक : अब तो भौर की ताजगी शीतल समीर सुख देती है, उपवन में पुष्प कोंपलें खिलती है जैसे उपवन में प्यार,.. महबूब अली देशनोक : आपाणी जिंदगी री धन्ना धन गाड़ी चलावे पेड़, मीठा मीठा रुत रा सगळा ने फळ खिलावे पेड़..

इसी बीच राष्ट्रीय कवि चौपाल समूह द्वारा यज्ञाचार्य पं नथमलजी पुरोहित एवं स्वामी वसुंधरा आनन्द महाराज जी का रत्न जड़ित मोतीयन माला श्री फल शाॅल पुष्प मालाएं द्वारा आत्मीय स्वागत किया गया
सिराजुद्दीन भुट्टा : मेरे मोला ऐसा बुढापा देना तन की सुगर ना बढ़े।.. कृष्णा वर्मा : एक वक्त था जब हम सबका दर्द सुना करते थे, आज़ व्यक्त है हम सबका अवसाद सुना करते हैं।.. अशोक सोनी : एक तुम ही आधार सद्गुरु एक तुम ही हो आधार।..
सईद अहमद : है दिल के लिए मौत मशीनों की, हुकूमत एहसास ए मुरव्वत को कुचल देते हैं हालात ।

आज के कार्यक्रम में 14 साहित्य प्रस्तुतियां रही कार्यक्रम में राधा किशन सोनी, महेश हर्ष, पवन चड्ढ़ा, धर्मेंद्र राठोड़, छोटू खां, बाबू लाल जांगिड़, सुरेश सोनी, घनश्याम सौलंकी, नत्थू खां, उमेश कुमार सेवग, लीलाधर , श्री कांत आर्यन आदि कई गणमान्य साहित्यानुरागी उपस्थित रहे कार्यक्रम संचालन विवेक वैराग्य दृष्टांत से रामेश्वर साधक ने किया जबकि आभार राजेन्द्र स्वर्णकार ने किया।


