हे भगवान.. इस बार लाज रख लेना, मेरी मेहनत का तू ही सहारा ।

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शिव कुमार सोनी और अज़ीज़ भुट्टा की रिपोर्ट।


बीकानेर 9 अक्टूबर
माटी कहें कुम्हार से एक दिन मैं रोदूगी तोए’’माटी के दिए बनाने वाले कुम्हारों को इस दीपावली परअच्छी बिक्री की आशा, करोनाकाल में रोद दी आर्थिक स्थिति।पीढ़ी दर पीढ़ी मिट्टी के दीपक, मटकी, गमले आदि बनाने वाले कुम्हारों को दो वर्ष के बाद इस दीपावली पर दीयों की अच्छी बिक्री की आशा है। करोना काल में आर्थिक स्थिति को रोद दिया। कच्ची मिट्टी, बर्तनों को पकाने में काम आने वाला बुरादा, गोबर की थेपड़ी, फूल झाड़ू बनाने के बाद अनुपयोगी घास के मूल्य के बढ़ने से ’’माटी कहें कुम्हार से एक दिन मैं रोदूगी तोए’’ वाले भजन के मुखड़े सी स्थिति हो रही है। हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी गरीबी,तंगहाली में दो जून की रोटी ही नसीब हो पाती है। बच्चों की शिक्षा, उनका लालन-पालन सपना साकार होता नजर नहीं आ रहा है।
बीकानेर के गंगाशहर के कुम्हारों के मोहल्ले में इन दिनों अधिकतर कुम्हार दुर्गा पूजा में काम आने वाले बड़े दीपक, करवा चैथ में उपयोगी करवें तथा दीपावली पर उपयोग होने वाले मिट्टी के दीपक, हटड़ी व कुल्हड़ी बनाने में लगे हैं। कई कुम्हार सपरिवार पुश्तैनी तरीके से पत्थर व सीमेंट की चाॅक से तथा कुछ बिजली की चाॅक से दीपक बनाने में मशगूल है।दीपावली से होली तक होता है कार्य- विकलांग दम्पति ठाकुर प्रजापति ने बताया कि होली के बाद मटकियां बनाते है, चातुर्मास लगते ही आषाढ़, सावन व भादों में तीन माह वर्षात व आंधी के आने के कारण अपने कार्य पर अवकाश रखते है। आश्विन व कार्तिक माह में दीपक व करवे, हटड़ी आदि बनाने का कार्य करते है। वर्ष में होली से दीपावली तक ही कार्य कर पाते हैं।इलैक्ट्रिक चाॅक में बिजली का बिल अधिक-उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से उसको इलैक्ट्रिक चाॅक उपलब्ध करवाई है, लेकिन चाॅक को चलाने पर आने वाले बिजली के बिल को भरना उनके लिए टेढी खीर बन जाती है । बिजली इतनी महंगी है कि कई माह बिल जमा नहीं करवा पाते । उन्हें तो सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग की ओर से स्वीकृृत विकलांग पेंशन मिलती है लेकिन उनकी पत्नी श्रीमती सरोज को आवेदन में बार-बार त्रुटियां निकालने के कारण पेंशन नहीं मिली है। मजदूरी कम व खर्चा अधिक होने के कारण उनके दो बच्चों की पढ़ाई भी नहीं करवा पाते।मिट्टी व ईंधन के दाम बढ़े-कुम्हारों के मोहल्ले के ही अशोक प्रजापत, चंदा प्रजापत ने बताया कि लोगों में फैशनेबल दीयों, चाइनीज व भारतीय आधुनिक दीपकों और बिजली की रंग बिरंगी रोशनी के प्रति रूझान बढ़ने से उनकी मेहनत से बनाएं गए परम्परागत दीपकों का वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाता है। कोलायत, लखासर व आम्बासर से मिट्टी आती है, खान विभाग की सख्ती से, पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ने से मिट्टी खरीदना भी कठिन हो गया। मिट्टी की आपूर्ति करने वाले भी कई बार कंकर युक्त मिट्टी को भेजकर उनके मेहनत पर पानी फेर देते है। कंकर युक्त मिट्टी से बने बर्तन मजबूत कम  हैं। हाथ से लकड़ी का डंडा चलाकर चाॅक को घुमाकर मिट्टी  के दीपक बनाने वाले अशोक  व राजू ने बताया कि श्रम का पूरा मूल्य नहीं मिलने से वे अपने बच्चों को इस पुश्तैनी धंघें से दूर रखना चाहते हैं।
नहीं मिलता सरकार की योजनाओं का लाभ।
जाति प्रमाण पत्र में पटवारी के हस्ताक्षर करवाना टेढ़ी खीर-केन्द्र व राज्य सरकार की अनेक जन कल्याणकारी योजनाएं भी गरीब व श्रमिकों के लिए है, अशिक्षित होने के कारण व योजना का लाभ लेने में अनेक तरह की औपचारिकता को पूरा नहीं करने के कारण लाभ नहीं उठा पाते। जाति प्रमाण पत्र बनवाने में सर्वाधिक कठिनाई का सामना करना पड़ता है, दो उतरदायित्व व्यक्तियों के हस्ताक्षर, उसके बाद पटवारी के हस्ताक्षर, फिर ई मित्र पर जाना सभी कठिनाई भरे कार्य होते है। कार्य पर अवकाश रखकर जाति प्रमाण पत्र पटवारी के हस्ताक्षर करवाना सबसे टेढ़ी खीर है। वे मिलते ही नहीं है ।  कई ई मित्रवाले निर्धारित राशि से दुगनी-तीन गुनी राशि लेकर पटवारी के हस्ताक्षर करवाकर जाति प्रमाण पत्र बनवाते है, इतनी राशि देना उनके बूते से बाहर रहती है। सरकार को चाहिए के प्रशासन शहरों के संग अभियान के दौरान घर-घर सर्वे करवाकर पात्र लोगों को सरकार की योजनाओं का लाभ दिलवाएं, उनके आवेदनों की पूर्ति तत्स्थल पर ही करें।

विकलांग दंपत्ति इलेक्ट्रॉनिक चौक पर दीपक तैयार करते हुए।
दीपावली की तैयारी में लगा पूरा परिवार।

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