कर्म है सुख-दुःख की प्राप्ति का कारण: आचार्य महाश्रमण

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श्रीमुख से श्रद्धालुओं को प्राप्त हो रही नित नवीन प्रेरणा

-मुनि कालू के अपने गुरुदेव के साथ विहार प्रसंगों का आचार्यश्री ने किया रोचक वर्णन

-दो नवदीक्षित साध्वियों को आचार्यश्री ने प्रदान की बड़ी दीक्षा (छेदोस्थापनीय चारित्र)

छापर, चूरू, 20 जुलाई। छापर चतुर्मास में निवासी, प्रवासी अथवा सेवार्थ पहुंचे श्रद्धालुओं को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के श्रीमुख से आगमाधारित नित नई पावन प्रेरणा प्राप्त हो रही है। साथ ही कालूयशोविलास की गायन और स्थानीय भाषा में रोचक वर्णन श्रद्धालुओं को नित प्रति प्रवचन में उपस्थित होने के लिए मानों आकर्षित कर रहा है। श्रद्धालु अपने आराध्य के श्रीमुख से इन प्रेरणाओं और पावन गाथाओं का श्रवण कर अपने जीवन को धन्य बना रहे हैं। वहीं आसपास की जैनेतर जनता भी ऐसे सुगुरु की सन्निधि में उपस्थित होकर नित दर्शन और आशीर्वाद का लाभ उठा रही है।

बुधवार को चतुर्मास प्रवास स्थल में बने भव्य प्रवचन पंडाल में उपस्थित श्रद्धालुओं को महान प्रवचनकार युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी भगवती सूत्र आगम के आधार पर पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि दार्शनिक और धार्मिक जगत में एक बात आती है कि सुख-दुःख की प्राप्ति कैसे होती है? इसके लिए धारणा के अनुसार तीन बाते बताई गई हैं- ईश्वर कर्तृत्ववाद। जहां यह मान्यता है कि ईश्वर के द्वारा ही प्राणी सुख अथवा दुःख को प्राप्त करता है। दूसरा है-अज्ञेयवाद। इसको मानने वाले लोगों का कहना है कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं कि सुख-दुःख कैसे प्राप्त होता है। तीसरी बात है -कर्मवाद। जो प्राणी जैसा कर्म करता है, उसका वैसा फल उसे प्राप्त होता है। प्राणी स्वयं द्वारा किए हुए कर्मों का ही फल भोगता है। एक प्रश्न पूछा गया कि क्या सभी प्राणी अपने किए कर्मों को भोगते हैं? उत्तर दिया गया कि कुछ भोगते हैं और कुछ नहीं भी भोगते हैं। जो कर्म उदय में आ गए तो वह भोेग लिया, अन्यथा आगे के किसी अन्य जन्म में भी भोगना होता है। स्वयं द्वारा किए हुए कर्मों का फल एक ही जन्म में भोग पाना संभव नहीं है। जैन दर्शन में आठ कर्म बताए हैं। इनमें चार घाति कर्म और चार अघाति कर्म हैं। जिनके आधार पर आदमी सुख-दुःख को प्राप्त होता रहता है। जो आदमी जैसा कर्म करता है, वैसा फल प्राप्त करता है। आदमी को पुण्यकाल के उदय में ज्यादा अहंकार नहीं करना चाहिए और पाप कर्मों के उदय के समय समता, शांति बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री ने कालूयशोविलास में मुनि दीक्षा के बाद मुनि कालू के अपने गुरु के साथ विहार आदि के प्रसंगों को रोचक वर्णन और गायन किया। तदुपरान्त आचार्यश्री कार्यक्रम में सात दिनों पूर्व नवदीक्षित साध्वियों को आज बड़ी दीक्षा प्रदान करते हुए उन्हें पांच महाव्रतों और रात्रि भोजन विरमण व्रत का स्वीकरण आर्षवाणी के माध्यम से कराते हुए छेदोपस्थापनीय चारित्र (बड़ी दीक्षा) प्रदान की। आचार्यश्री ने नवदीक्षित साध्वीद्वय को प्रेरणा प्रदान की। इसके पूर्व नवदीक्षित साध्वियों ने अपनी-अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति भी दी। साध्वी साधनाश्रीजी ने आचार्यश्री से नौ की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। वहीं श्रीमती जतनदेवी छाजेड़ ने अठाई की तपस्या का प्रत्याख्यान किया।

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