अकेले हम बून्द हैं मिल जाएं तो सागर है, अकेले हम धागा हैं मिल जाएं तो चादर है

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बीकानेर, 22 जनवरी। पर्यटन लेखक संघ-महफिले अदब की साप्ताहिक काव्य गोष्ठी की 564 वीं कड़ी के तहत रविवार को होटल मरुधर हेरिटेज में हिंदी-उर्दू के रचनाकारों ने कलाम सुना कर वाह वाही लूटी।
अध्यक्षता करते हुए डॉ जगदीशदान बारहठ ने एकता की ताकत पर बल दिया।
अकेले हम बून्द हैं मिल जाएं तो सागर है
अकेले हम धागा हैं मिल जाएं तो चादर है


मुख्य अतिथि कमल किशोर पारीक ने पिता को समर्पित रचना प्रस्तुत की-
संस्कारों के थे वे गुलदस्ता
प्रेम की डोर से बंधा था रिश्ता
वरिष्ठ शाइर ज़ाकिर अदीब ने तेवर के शेर सुनाये-
हम ने ज़ुल्म परस्तों को ललकारा है
अब ये बग़ावत है तो बग़ावत करते हैं
संयोजक डॉ ज़िया उल हसन क़ादरी ने इश्किया ग़ज़ल पेश कर दाद हासिल की-
हुस्न में वो असर रहा ही नहीं
तीर दिल तक कभी गया ही नहीं
असद अली ने “मेरे मेहरबां में है”, इम्दादुल्लाह बासित ने “मेरे मोहसिन की हर अदा कामिल”, शारदा भारद्वाज ने “सुना है नया साल आया है”, राजकुमार ग्रोवर ने “कोई भी मज़हब आपस में नहीं लड़ा है” व प्रदीप कुमार चौधरी ने कविता सुना कर दाद लूटी।संचालन डॉ ज़िया उल हसन क़ादरी ने किया।

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