ये बेटी है तो पूरे घर को अपनी मीठी सी बोली से चहकाना है, बेटी को ही अपने माँ बाबा के आंगन को फूलो सा महकाना है ।
अंतराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष कविता
औरत का जिस्म महज जिस्म नही ये तो एक किमती गहना है ।
बेटी फिर बहन किसी की दुल्हन से मां तक सफर तय करना है ।
बेटे की चाहत में बेटियों की कुर्बानी देने वाले ये नहीं जानते है ।
इस पेड़ की छाव के नीचे ना जाने कितने रिस्तो को रहना है ।
ये बेटी है तो पूरे घर को अपनी मीठी सी बोली से चहकाना है ।
बेटी को ही अपने मां बाबा के आंगन को फूलो सा महकाना है ।
बेटे को जो सहारा और बेटियों को घर का बोझ समझते है ।
जान ले पराई अमानत है कहाँ ये उसका अपना आशियाना है ।
औरत अगर बहन है तो उसको एक दोस्त का फर्ज निभाना है ।
भाई की ख्वाहिश के लिए बहन को मां बाबा को भी मनाना है ।
जिनको नही पता है की बहन का होना कितना जरूरी होता है ।
बताओ बहन ना होगी तो कलाई पर धागा किस से बंधाना है ।
औरत अगर दुल्हन है तो उसको महबूब का घर भी सजाना है ।
दुल्हन बन कर उसे फिर उनकी नस्लों को भी आगे बढ़ाना है ।
वो जो शादी के बाद औरत को अपने पैर की जूती समझते है ।
एक दिन फिर उनकी बहन बेटी को भी पराए घर जाना है ।
औरत अगर मां है तो उसे अपने बच्चो को संस्कार सीखाना है ।
बच्चो को उसे इस दुनिया में इंसानियत का पाठ पढ़ाना है ।
अपने ऐश आराम के खातिर जो मां को घर से निकालते है ।
मां की इज्जत ना करने वालो फिर क्यों हमे इंसान बताना है ।

अब्बास राजस्थानी



