रंग मल्हार ” 2026 का आयोजन 12 जुलाई को
टुडे राजस्थान न्यूज़ ( अज़ीज़ भुट्टा )
बीकानेर 05 जुलाई। डॉ. विद्यासागर उपाध्याय वरिष्ठ चित्रकार समकालीन भारतीय कला राजस्थान के एक बहुत ही महताऊ कला विचार ” रंग मल्हार ” 2026 का आयोजन आगामी 12 जुलाई 2026 को एक दिवसीय चित्र कार्यशाला जो की ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों स्वरुप में आयोजित होगी और जिसमे कोई भी चित्रकार सहभागिता ले सकने में स्वतंत्र है।
डॉ. विद्यासागर उपाध्याय का ये कला विचार इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये कला विचार मानव कल्याण की मनसा से किया जाता है ! जिसमे प्रकृति के प्रत्येक जिव जंतु के साथ मानवीय जीवन के लिए खुशहाली की मंगल कामनाएं चित्रण कार्य रूपी अनुष्ठान के जरिये की जाती है और उसमे जुड़ने वाला प्रत्येक कलाकार अपने चित्रण कार्य से इस अनुष्ठान में आहुति देता है विश्व कल्याण के लिए , इस सावन माह में अच्छी प्राकृतिक वर्षा की मनोकामना करते हुए ।

इस “रंग मल्हार” चित्रण कार्यशाला की एक और विशेषता है और वो है इसमें चित्रित होने वाला ऑब्जेक्ट , जो प्रतिवर्ष एक अलग ऑब्जेक्ट का चयन करते हुए उसपर चित्रकार अपनी रूचि अनुसार चित्रण करता है ! और उस ऑब्जेक्ट को जो की चित्रण का सामान्य कैनवास नहीं होता पर फिर भी उसे कैनवास बना दिया जाता है और उस ऑब्जेक्ट को एक आर्टिफीसियल लुक भी मिल जाता है ! इस वर्ष का ऑब्जेक्ट चुना गया है संदूक, पौराणिक पेटी, बॉक्स जिस पर रंग मल्हार 2026 के सभी राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय प्रतिभागी दिनाक 12 जुलाई को चित्रित करेंगे !
मैंने संदूक पर रंग के जरिये टैक्सचर फॉर्म में कई तर्क विचार एक साथ अभिव्यक्त करने की कोशिश की है , जिसमे छोटे छोटे जमीन के टुकड़े का भाव जो कुछ सूखे है कुछ हरे भरे , दूसरा भाव विखंडन का , तीसरा भाव पौराणिक संदूक हमेशा परिवार के खजाने की प्रतिक रही है अब वो खजाना संस्कारों का भी होता है तो हिरे जेवरातों का भी और परिवार के बुजुर्गों के आशीर्वाद से लबरेज रंग बिरंगे खुशियों के खजाने सा भी और चौथा भाव कला का है मोजाइक शैली में आर्ट इफ़ेक्ट , डिज़ाइन फॉर्म का अकादमिक ।
इस बॉक्स संदूक को चित्रित करते हुए मैंने कई बार मेरे स्वर्गीय दादा जी बुलाकीदास पुरोहित की वो बोली भी याद की जिसे वे अक्सर गुन गुनाते थे सुबह सुबह नहाने के बाद खास कर सर्दी में जब उन्हें नहाने के बाद ठण्ड लगती थी ! वे गाते ” राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट , तब पछताए होत क्या बन्दे , जब प्राण जाएंगे छूट !



