संवाद-दु:खों से निवृत्ति एवं सुख शांति की प्राप्ति के उपाय- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक

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टुडे राजस्थान न्यूज़ (अज़ीज़ भुट्टा )

संवाद-दु:खों से निवृत्ति एवं सुख शांति की प्राप्ति के उपाय- स्वामी विवेकानंद परिव्राजक
माता कौशल्या देवी की स्मृति में पर्यावरण पोषण यज्ञ समिति एवं आरएसवी ग्रुप ऑफ स्कूल्स द्वारा आयोजित तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम में रोजड गुजरात से पधारे दर्शन योग महाविद्यालय के निदेशक-योगाचार्य एवं दर्शनाचार्य स्वामी विवेकानंद परिव्राजक ने स्थानीय होटल पाणिग्रहण में उपस्थित प्रबुद्ध, गणमान्य व्यक्तियों, श्रोताओं एवं विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों को दुःखों से निवृत्ति एवं सुख शांति की प्राप्ति के उपाय से परिचित करवाया।

6 दर्शन तथा 11 उपनिषदों और वेदों का अध्ययन कर चुके स्वामी जी ने देश के प्रख्यात संस्थानो, विश्वविद्यालय, व्यापारिक एवं औद्योगिक प्रतिष्ठान आदि में वैदिक प्रवचन एवं शंका समाधान से संबंधित संवाद एवं व्याख्यान किए हैं। स्वामी जी आध्यात्मिक शंका समाधान के विशेषज्ञ हैं तथा नेपाल, इंग्लैंड और दुबई में भी आपके कार्यक्रम हो चुके हैं। छोटी काशी बीकानेर में आपके कार्यक्रम 21, 22 और 23 अगस्त को शाम 5:45 से 8:00 बजे तक रानी बाजार स्थित होटल पाणिग्रहण में होंगे।


भारत के प्रथम र्तकशास्त्री का पुरस्कार प्राप्त करने
के बाद आपने न्याय शास्त्र का 150 बार अध्ययन किया है।विद्यार्थी अपने जीवन में 54 प्रकार की गलतियां करता, कुछ गलतियां हो जाती हैं जबकि कुछ जानकर की जाती हैं।विद्यार्थियों को सरल भाषा में समझाया गया कि पढ़ाई क्यों करें, पढ़ाई के क्या लाभ है। अध्ययन के उद्देश्यों को भी स्पष्ट किया गया।प्रत्येक व्यक्ति को अपनी रुचियां को पहचाना चाहिए तथा उसके अनुरूप ही कार्य करना चाहिए उन्हें सूचीबद्ध कर नियमित रूप से दोहराना चाहिए तथा उनके अनुरूप ही कार्य करना चाहिए। इससे कार्य करने में प्रसन्नता होगी तथा दुःखों में कमी आएगी।शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। माता-पिता तथा गुरु ही शिक्षा प्रदान कर सकते हैं।

माता-पिता को परिवार के संस्कार तथा चरित्र की शिक्षा प्रदान करना अत्यंत आवश्यक है। आपको मनुष्य का जीवन मिला है यह आपके कर्मों का फल है।कर्म पहले किया जाते हैं उसके पश्चात फल मिलता है।यही हमारे सुख और दुःखों का मूल कारण है ।मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुखी है परंतु 100% सुखी नहीं है इसका कारण मनुष्य का स्वार्थ है।
मनुष्य को अच्छे कर्म करने के अनेकों अवसर प्राप्त होते हैं परंतु हम स्वार्थवश इन अवसरों का सदुपयोग नहीं करते। यदि हम अपने बालक बालिकाओं को सद्बुद्धि प्राप्त करने के लिए प्रेरित करेंगे एवं सन्मार्ग पर चलना सिखाएंगे तो निश्चित रूप से वह सुख प्राप्ति की ओर अग्रसर होंगे अन्यथा दुःख निश्चित है। कुछ बातों को समझना पड़ता है सभी बातों को देखना संभव नहीं है।

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